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सिलीसेढ़ का पानी और वादों की प्यास! कलम गवाह है—जब प्यास सिर्फ गले में नहीं, भरोसे में भी थी…

By Shubh Bhaskar · 18 Feb 2026 · 7 views
सिलीसेढ़ का पानी और वादों की प्यास!

कलम गवाह है—जब प्यास सिर्फ गले में नहीं, भरोसे में भी थी…

*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*

(माचाड़ीअलवर):- अलवर- राजस्थान के अलवर जिले में स्थित सिलीसेढ़ झील का पानी इन दिनों केवल जल संकट नहीं, बल्कि जनभावनाओं और राजनीतिक वादों के टकराव का प्रतीक बन गया है। ढाई पेढ़ी पर लगे बैरिकेड सिर्फ रास्ता नहीं रोक रहे थे—वहाँ उम्मीदों और आशंकाओं की भी दो लकीरें खिंची हुई थीं।
एक ओर करीब पाँच सौ ट्रैक्टरों का सागर था। ग्रामीण अडिग खड़े थे, इस संकल्प के साथ कि सिलीसेढ़ का पानी शहर की ओर नहीं जाने देंगे। दूसरी ओर वर्दी में खड़ी प्रशासनिक व्यवस्था थी, कानून और आदेशों का पहरा देती हुई। और इन दोनों के बीच खड़ा था एक गवाह—न शहर का, न गाँव का—बस उस क्षण का साक्षी।
ग्रामीणों ने आत्मीयता से भोजन कराया। पूरी और आलू की सब्जी में अपनापन घुला था। लेकिन जब पानी माँगा, तो लोटा ठहर गया और शब्द बह निकले—
“पीना है तो यहीं पी लो, ढाई पेढ़ी पार का पानी शहर नहीं जाएगा।”
जवाब में भरोसे की एक बात कही गई—
“मेरे चुने हुए जननायक ने वादा किया है, यह पानी शहर ले जाकर रहेगा। यह उनका वचन है।”
ग्रामीण मुस्कुराए। वह मुस्कान अनुभव और व्यंग्य दोनों से भरी थी।
“हमारे नायक ने भी हमसे पानी रोकने का वादा किया था। उसका वादा झूठा निकला। तुम्हारे वाले का भी झूठा निकलेगा।”
उस क्षण लगा, ढाई पेढ़ी पर पानी नहीं—विश्वास रोका हुआ है।
जब पूछा गया, “तो मैं क्या करूं? प्यासा चला जाऊं?”
तो जवाब हँसी में आया—
“नहीं, पानी तो यहीं मिल रहा है, पी लो। ट्रैक्टर में डीजे बज रहा है, नाच लो। हमसे गले मिलो, जैसे तुम्हारे जननायक मिलते हैं… और शांति से चले जाओ।”
एक बुजुर्ग ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
“भाईचारा बनाए रखना। बीच की फूट कई लोगों के लिए सत्ता की मिठाई होती है।”
उस दिन समझ आया—प्यास सिर्फ गले की नहीं थी, प्यास भरोसे की थी।
और ढाई पेढ़ी पर पानी से ज्यादा, वादे सूख रहे थे।

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