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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की छवि खराब करने का (असफल) प्रयास कर रहे हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी

By Shubh Bhaskar · 22 Jan 2026 · 49 views
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की छवि खराब करने का (असफल) प्रयास कर रहे हैं
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी

सुनील कुमार मिश्रा (बद्री) दैनिक शुभ भास्कर उत्तर प्रदेश प्रयागराज संगम देश विदेश और प्रदेश के हिंदू सनातनी भी योगी जी के साथ खड़े हैं और सब आपका तमाशा देख रहे हैं समझ रहे हैं ना समझ नहीं है जिस तरह से महाकुंभ का सफल आयोजन हुआ कुंभ में 75 करोड़ जनता ने स्नान किया। एक भी साधु संत बिना स्नान किए वापस नहीं लौटा।। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द को जहां रोड बंद था, वही से जाना था।। यह शंकराचार्य की गरिमा को धूमिल कर रहे। है।। हर चीज में इनको राजनीति करनी है, और भी हमारे शंकराचार्य है।
शंकराचार्य जी ने अपने युवाकाल में एक अच्छा फैसला लिया था और उन्होंने छात्र संघ का चुनाव लड़ा। यदि वह उसी दिशा में आगे बढ़ते तो बहुत योग्य राजनीतिज्ञ होते। लेकिन वह अध्यात्म की तरफ़ कूच कर गए परन्तु उनका मन और वृत्ति अभी भी राजनीति में लगी हुई है। बिना मीडिया के उनकी तबियत ख़राब होने लगती है। महीने में एक बार मीडियाबाज़ी आवश्यक है।
खैर इनके गुरु स्वरूपानंद भी जीवन भर राजनीति में ही रहे। स्वरूपानंद के गुरु करपात्री भी राजनीतिज्ञ ही थे। रामराज्य पार्टी के दोनों लोग संस्थापक थे। कभी हिंदुओं के लिए कोई अच्छा काम नहीं सोचा।
काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को रोकने के लिए बाबा राघव दास के विरोध में खड़े हुए, ग़ैर ब्राह्मणों की शिक्षा के विरोध में महामना मदन मोहन मालवीय के विरोध में खड़े हुए। आचार्य श्री राम शर्मा के महिला शिक्षा आंदोलन के विरोध में खड़े हुए, संघ के द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य गुरु जी के विरोध में पूरी किताब लिख डाली थी और बताया कि संघ की शाखा में सभी जाति के लोग जो साथ बैठकर खेल कूद चर्चा करते हैं, इससे ब्राह्मणों का ब्राह्मणत्व चला जाएगा। इसी तरह नीम करौली बाबा से लड़ लिए क्यूंकि वह बंद पड़े मंदिरों में किसी भी जाति के व्यक्ति से उसकी साफ़ सफाई और पूजा पाठ का आग्रह करते थे।
करपात्री, स्वरूपानंद ने जो रास्ता अपनाया, वही रास्ता उनके चेले अविमुक्तेश्वरानंद ने अपना लिया, संत के चोले में हिंदू एकता को तोड़ना और राजनीति करना ही उदेश्य है। यदि इन्हे राजनीति करना ही है तो उमा जी, योगी जी, साध्वी निरंजन जी की तरह सीधे राजनीति में आ जाये। गुरुदेव की मृत्यु के बाद बिना प्रयास ही पद तो मिल गया, कद तो अपने से बनाना होता है। उसके लिए ध्यान, साधना, मनन, चिंतन, लेखन करना होता है, पर वह होना मुश्किल है।
कभी सपा राज में लाठी खा रहे हैं तो कभी भाजपा राज में नौटंकी कर रहे हैं।
हिंदू धर्म के आध्यात्मिक धरातल को कमजोर करने में ऐसे लोगों का सबसे बड़ा हाथ है। भगवान इनसे हम सबको बचायें। हमारा धर्म ऐसे ढोंगी लोगों से मुक्त हो।

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