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प्रवासियों और शरणार्थियों को खतरा क्यों मान रही है दुनिया ?*

By Shubh Bhaskar · 20 Jan 2026 · 11 views
🤯🥷*प्रवासियों और शरणार्थियों को खतरा क्यों मान रही है दुनिया ?**🤬🥷

*🥶🥵क्या कोई भी गृहस्वामी अपने घर किसी ऐसे मेहमान, शरणार्थी को प्रश्रय देना चाहेगा जो उसके अस्तित्व को ही समाप्त करदे ? क्या आप स्वयं ऐसा चाहेंगे ??*🫵😳

लेखक- *डॉ अवधेश त्रिपाठी जी* मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध *बाल-रोग चिकित्सक होने के साथ साथ एक उच्च क्षेणी के दार्शनिक, प्रमाशदत्ता, एवं लेखक हैं!



सुनील कुमार मिश्रा बद्री दैनिक शुभ भास्कर व्यक्ति की पहचान उसका सोचने का ढंग और तद्नुसार आचरण एवं व्यवहार है।*

*परभक्षी (Predator) वह होते हैं जो अपने आश्रयदाता को ही समूल नष्ट कर देते हैं, जैसे अमरबेल*

*इस्लाम और क्रिश्चियनिटी ने जिस देश की ओर भी मुख किया, उन्होंने वहाँ की संस्कृति, सभ्यता, शिक्षा को न सिर्फ नष्ट-भ्रष्ट-खंडित किया, संसाधनों का दोहन किया, अपितु वहाँ के मूल निवासियों का धर्मांतरण कराया एवं आर्थिक शोषण किया है / कर रहे हैं।*

*इस्लाम ने शुरू से ही आक्रामक, बर्बर, नृशंस, अमानवीय व्यवहार को अपनाया है*

*सनातन की तो सदैव से यही मान्यता रही है - आ नो भद्रा: कृतवो यन्तु विश्वत:।*

*विश्व में समस्याओं की जड़ इस्लामिक प्रवासी एवं शरणार्थी हैं*
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व्यक्ति का पहचान भेद उसकी भौगोलिक उपस्थित या फिर धार्मिक मान्यताएं नहीं हैं। *व्यक्ति की पहचान उसका सोचने का ढंग और तद्नुसार आचरण एवं व्यवहार है।*

जन्म व्यक्ति को पैत्रिक पहचान देता है जिसका आधार माता-पिता एवं भू-मण्डल पर उसकी उपस्थिति, देश व स्थान के रूप में होते हैं। तद्नुसार वहाँ की *भौगोलिक परिस्थिति, मान्यताओं और रीति-रिवाजों एवं व्यवस्था के अनुसार वह विकसित होता है।*

परिस्थितियाँ उसे अपनी जड़ों से विस्थापित होकर अन्यत्र बसने के लिए प्रेरित या फिर विवश करती हैं। *प्रेरणा के आधार विकास की कामना है, जैसे - बौद्धिक, आर्थिक, व्यापारिक एवं जीवनस्तर* की बेहतर सम्भावनाएँ। जबकि विवशता में जीवन एवं अस्तित्व को बचाने का संघर्ष व प्रयास होता है। स्वाभाविक है तब वैश्विक होते जगत में उनके प्रति संवेदना, दयालुता, सहिष्णुता एवं सहयोग की अपेक्षा मनुष्यता की परिभाषा में सहजीवन के साथ अपेक्षित है।

सहजीवन (Symbiosis) में दो पक्ष परस्पर मिलकर एक-दूसरे को जीवन जीने, उन्नति करने में सहायक होते हैं। इनकी सहज स्वीकार्यता होती है। वहीं *परजीवी Parasite जीवनयापन के लिए दूसरे पर आश्रित होते हैं*। उन्हें थोड़ी असुविधा के साथ स्वीकार कर लिया जाता है। किन्तु *परभक्षी (Predator) वह होते हैं जो अपने आश्रयदाता को ही समूल नष्ट कर देते हैं, जैसे अमरबेल*। अमरबेल, वह पौधा है जो जिस किसी पौधे का आश्रय पाकर जीवित रहता, उन्नति करता है ; उसका सम्पूर्ण जीवनरस चूसकर आश्रयदाता के अस्तित्व को ही समाप्त कर देता है।

विश्व इतिहास में दृष्टि डालने पर अतीत में *भारत-भू ही थी जिसने अपनों द्वारा ठुकराये, उजाड़े गये, विस्थापित किये गये लोगों को आश्रय दिया था*। फिर वे पारसी हों या यहूदी जबकि भारतीय लोग जिन देशों में गये वे ठुकराये, उजाड़े गये लोग नहीं थे / हैं। वे स्वेच्छा से बेहतर जीवन की आशा, व्यापार या फिर यशस्वी जीवन की कामना पाले वहाँ गये थे / गये हैं। उन्होंने वहाँ की उन्नति, समृद्धि एवं विकास में बिना स्थानीय संस्कृति को नष्ट किये, अभूतपूर्व योगदान किया है। इसके पीछे वह *सनातन सिद्धान्त है जो सिखलाता है कि मान्यताओं और रीति-रिवाजों का आधार स्थानीय होता है*। अन्यथा सारी वसुधा एक कुटुंब है जहाँ प्रेम, सौहार्द, सहयोग एवं संवेदना के साथ ही रहा जा सकता है। फलतः उन्होंने कोई धर्मान्तरण नहीं कराया, अपनी जीवनशैली को बलात नहीं थोपा। वे जहाँ भी रहे अपना सर्वश्रेष्ठ देकर भी अनिकेत भाव (रहने के स्थान पर ममता से रहित) से रहे।

जबकि *इस्लाम और क्रिश्चियनिटी ने जिस देश की ओर भी मुख किया, उन्होंने वहाँ की संस्कृति, सभ्यता, शिक्षा को न सिर्फ नष्ट-भ्रष्ट-खंडित किया, संसाधनों का दोहन किया, अपितु वहाँ के मूल निवासियों का धर्मांतरण कराया एवं आर्थिक शोषण किया है / कर रहे हैं।* ईसाइयत ने इस बारे में आकर्षक एवं सोफ्ट विधियों का आश्रय लिया है। जबकि *इस्लाम ने शुरू से ही आक्रामक, बर्बर, नृशंस, अमानवीय व्यवहार को अपनाया है*।

व्यक्ति हो या इतिहास, उसके निर्माण में धर्म, दर्शन, काव्य, कला और समाज होता है जिसे संयुक्त रूप से संस्कृति कहा जाता है। साथ ही समाज को बनाने में लोगों की मनोवृत्ति की अहम भूमिका होती है। शिक्षा और संस्कार इन्हें पुष्ट करते हैं। इस्लामिक प्रवासियों और शरणार्थियों को आज वैश्विक जगत, यहाँ तक कि 57इस्लामिक देश भी समान धार्मिक मान्यताओं के होते हुए भी - *उन्हें न सिर्फ अपने ऊपर आर्थिक बोझ की तरह देखते हैं बल्कि उन्हें स्थानीय संस्कृति, सभ्यता, शिक्षा, समाज, सुरक्षा जैसे जीवन के मूलभूत स्तम्भों के लिए असुरक्षा तथा जोखिम मानते हैं*। वे भी उन्हें अपने यहाँ शरण नहीं देते। इस्लामिक शरणार्थियों के प्रति यह धारणा यकायक नहीं बन गई है। इसके पीछे लम्बा, सुव्यवस्थित एवं प्रामाणिक इतिहास है।

विश्व में सभ्यताएँ अपने विकास में प्रयोग भले ही कितने भी करलें किन्तु वे श्रेष्ठ का वरण कर, उसे अंगीकार करते हुए आगे बढ़ती हैं। *सनातन की तो सदैव से यही मान्यता रही है - आ नो भद्रा: कृतवो यन्तु विश्वत:।* उसने हमेशा प्राकृतिक विषमता की तीव्रता को कम करने और मानवकृत विषमता को समाप्त करने का प्रयास किया है। अपने विकास में शिक्षा के साथ ईसाइयत ने भी बाद में इस ओर ध्यान देना शुरू किया। किन्तु विश्व में इस्लाम एकमात्र कट्टरता के साथ धर्म आधारित मान्यता है जो अपने जन्म से 1400 वर्ष बीत जाने के बाद भी मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदकारी, अमानवीय व्यवहार, अत्याचार, हिंसा, आक्रामकता, आतंक का न सिर्फ समर्थन करता है बल्कि उसे सम्पूर्ण मानवता की जीवनशैली बनाने का हठ पालता है। इतना ही नहीं इसे वह धार्मिक आधार बनाकर मानवीय सभ्यता को आदम और प्रतिगामी बनाने की जिद पाले बैठा है।

*यूँ तो विश्व में समस्याओं की जड़ इस्लामिक प्रवासी एवं शरणार्थी हैं, किन्तु वामपंथी तथाकथित बुद्धिजीवी अपने विमर्श में समस्या को शब्दजाल से सामान्यीकरण कर उसे व्यापक बनाने का भरसक प्रयास करते हैं*। जबकि प्रवासियों एवं शरणार्थियों की समस्या के मूल में इस्लाम है। इस्लामिक प्रवासी और शरणार्थी ऐसा करने के लिए वे जिन विधियों का सहारा लेते हैं उनमें प्रमुख हैं -

• *जनसंख्या विस्फोट कर स्थानीय सामाजिक, आर्थिक, व्यवस्थागत और राजनैतिक परिदृश्य को बदलना*।
• *धर्मान्तरण को बढ़ावा देना*।
• *स्वयं की मान्यताओं एवं धारणाओं को जबरन थोपना*।
• *स्थानीय व्यवस्था को इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार लागू करने की जिद करना*।
• *संसाधनों पर कब्जा कर सांस्कृतिक बदलाव लाना*।
• *मदरसा शिक्षा द्वारा आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता*।
• *आतंकवाद को बढ़ावा*।
• *राष्ट्र की सुरक्षा एवं सम्प्रभुता के लिए खतरा पैदा करना*।

विचारणीय है कि *क्या कोई भी गृहस्वामी अपने घर किसी ऐसे मेहमान, शरणार्थी को प्रश्रय देना चाहेगा जो उसके अस्तित्व को ही समाप्त करदे ? क्या आप स्वयं ऐसा चाहेंगे ??*

*दुर्भाग्य से विश्व के अनेक देशों* के प्रवासियों को कुटिलता के साथ इस्लामिक शरणार्थियों के साथ मिलाकर विमर्श के केन्द्र में ला दिया जाता है। यहाँ उद्देश्य इस्लामिक शरणार्थियों की नाजायज़ हरकतों पर से ध्यान हटाना होता है। परिणाम में दुनिया का प्रवासियों और शरणार्थियों को खतरा मानते हुए उनके प्रति असहिष्णुता का होना है। यह *रहीम की उस उक्ति* को चरितार्थ करता है कि -

बस कुसंग चाहत कुशल,
रहिमन यह अफसोस।
*महिमा घटी समुद्र की*,
*रावन बसा परोस।।*





लेखक- *डॉ अवधेश त्रिपाठी जी*मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध *बाल-रोग चिकित्सक होने के साथ साथ एक उच्च क्षेणी के दार्शनिक, प्रमाशदत्ता, एवं लेखक

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