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आदि गुरु शंकराचार्य जयंती पर सनातन चेतना के पुनर्जागरण का आह्वान – *डॉ. सुरेश चंद शर्मा*

By Shubh Bhaskar · 21 Apr 2026 · 5 views
आदि गुरु शंकराचार्य जयंती पर सनातन चेतना के पुनर्जागरण का आह्वान – *डॉ. सुरेश चंद शर्मा*

*नागपाल शर्मा माचाड़ी की रिपोर्ट*

(माचाड़ीअलवर):- बहरोड- अलवर जिले के बहरोड़ में सनातन धर्म के पुनरुद्धारक एवं अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य की जयंती 21 अप्रैल 2026, मंगलवार को वैशाख शुक्ल पंचमी के पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर समाज में आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जागरण का आह्वान किया गया। सर्व समाज जागृति संघ के संस्थापक व बृजवासी गौरक्षक सेना भारत संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
*डॉ. सुरेश चंद शर्मा* ने बताया कि इस वर्ष आदि शंकराचार्य का 1238वां जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। उन्होंने अपने अल्पायु जीवन में सनातन धर्म को एक सशक्त दार्शनिक आधार प्रदान किया और समाज में व्याप्त धार्मिक भ्रम, मतभेद तथा वेदों की सही शिक्षा के अभाव को दूर करने का कार्य किया।
उन्होंने बताया कि आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना कर धर्म, संगठन और ज्ञान के प्रसार का कार्य किया। इनमें उत्तर में ज्योर्तिमठ (बद्रीनाथ), दक्षिण में श्रृंगेरी शारदा पीठ, पूर्व में गोवर्धन मठ पुरी तथा पश्चिम में द्वारका पीठ शामिल हैं। इन मठों की जिम्मेदारी उन्होंने अपने योग्य एवं समर्पित शिष्यों को सौंपी।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने मात्र 16 वर्ष की आयु में वेदों का गहन ज्ञान प्राप्त कर लिया था और अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रमुख कृतियों में विवेक चूड़ामणि, भज गोविंदम, मनीष पंचक तथा सौंदर्य लहरी शामिल हैं, जो आज भी हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
उन्होंने आगे बताया कि आदि शंकराचार्य ने पंचायतन पूजा पद्धति की स्थापना की, जिसमें भगवान शिव, देवी शक्ति, भगवान विष्णु, भगवान सूर्य और भगवान गणेश की उपासना की जाती है। उन्हें भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है, जिन्होंने सनातन धर्म को नई चेतना और एकता का संदेश दिया।
*डॉ. शर्मा* ने कहा कि आदि शंकराचार्य के जीवन से हमें अद्वैत, एकता, समन्वय, विवेक और विचार की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने अंधविश्वास के स्थान पर तर्क और ज्ञान को महत्व दिया तथा समाज में सुधार और जागरूकता का मार्ग प्रशस्त किया।
अंत में उन्होंने आह्वान किया कि हम सभी उनके बताए मार्ग पर चलकर ज्ञान और कर्म का संतुलन बनाए रखें तथा समाज में सकारात्मक विचारों का प्रसार करें, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने भाग्य का निर्माता होता है।

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