संस्कार, सेवा और शिक्षा का संगम: पुण्यार्थम् में महारानी कॉलेज छात्राओं की जमीनी अनुभव यात्रा
By Shubh Bhaskar ·
13 Apr 2026 ·
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संस्कार, सेवा और शिक्षा का संगम: पुण्यार्थम् में महारानी कॉलेज छात्राओं की जमीनी अनुभव यात्रा
दैनिक शुभ भास्कर राजस्थान श्रीमती हंसा जयपुर। कच्ची बस्तियों से शुरू हुआ पुण्यार्थम् अभियान आज राजस्थान में हजारों बच्चों के जीवन में शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता का प्रकाश फैला रहा है। यह पहल भगवान महावीर चाइल्ड वेलफेयर ट्रस्ट के अंतर्गत संचालित हो रही है, जिसका उद्देश्य वंचित वर्ग के बच्चों तक शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करना है।
यह अभियान न केवल बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान कर रहा है, बल्कि उन्हें संस्कार, आत्मविश्वास और कौशल विकास के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी कार्य कर रहा है।
कच्ची बस्तियों से शुरू हुआ परिवर्तन
पुण्यार्थम् की विशेषता यह है कि यह बच्चों को केंद्रों तक लाने के बजाय स्वयं उनके बीच पहुँचकर शिक्षा प्रदान करता है। इसकी शुरुआत हसनपुरा की कच्ची बस्तियों से हुई, जहाँ संसाधनों की कमी के बीच बच्चों को नियमित शिक्षा से जोड़ा गया।
प्रत्येक बस्ती में शिक्षिकाएँ नियुक्त की गई हैं, जो केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि बच्चों में अनुशासन, नैतिक मूल्य और जीवन कौशल विकसित करने का कार्य भी कर रही हैं।
समग्र विकास पर आधारित शिक्षा मॉडल
इस अभियान के अंतर्गत बच्चों को निःशुल्क शिक्षा के साथ-साथ खेल, कला, सांस्कृतिक गतिविधियों, डिजिटल शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य बच्चों का सर्वांगीण विकास कर उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना है।
महारानी कॉलेज छात्राओं का जमीनी अनुभव
इस सामाजिक पहल से महारानी कॉलेज जयपुर की लगभग 500 छात्राओं ने इंटर्नशिप के माध्यम से जुड़कर वंचित बस्तियों की वास्तविक स्थिति को करीब से समझा।
छात्राओं ने बताया कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों में सीखने की प्रबल इच्छा होती है, लेकिन संसाधनों की कमी उनके विकास में बाधा बनती है। पुण्यार्थम् संस्था इन बच्चों को शिक्षा और संस्कार दोनों से जोड़ने का सराहनीय कार्य कर रही है।
छात्रा लक्षिता ने बताया कि उन्होंने देखा कि कैसे टीम तेज धूप में भी बच्चों के लिए कक्षाएँ संचालित करती है और चित्रों व गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाई को सरल बनाती है।
छात्रा टीना के अनुसार, बच्चों को नियमित स्टेशनरी उपलब्ध कराई जाती है और उनका ध्यान ऐसे रखा जाता है जैसे वे एक सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण में हों।
छात्रा रंजना ने बताया कि यहाँ त्योहारों और जन्मदिन को सादगी और भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाया जाता है, जिसमें तिलक, मौली और मुंह मीठा कराने जैसी परंपराएँ शामिल हैं, जो उन्हें अत्यंत प्रेरणादायक लगीं।
छात्रा कुमोदनी ने कहा कि उन्होंने यहाँ टीमवर्क और सहयोग की वास्तविक शक्ति को समझा। उनके अनुसार, “संगठन में ही शक्ति है” का वास्तविक अर्थ उन्होंने यहीं अनुभव किया।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
पुण्यार्थम् का लक्ष्य केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि बच्चों को छोटे-छोटे कौशल सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना भी है, ताकि वे भविष्य में आर्थिक रूप से सक्षम बन सकें।
नेतृत्व और संचालन
इस अभियान का संचालन संजय कुमार के नेतृत्व में किया जा रहा है, जबकि नवीन शर्मा जयपुर क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में बच्चों को शिक्षा, भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
व्यापक प्रभाव
वर्तमान में यह पहल राजस्थान भर में लगभग 330 शिक्षा केंद्रों के माध्यम से सक्रिय है, जहाँ कच्ची बस्तियों के बच्चों तक शिक्षा, संस्कार और सहयोग का संदेश पहुँचाया जा रहा है।
निष्कर्ष
पुण्यार्थम् यह संदेश देता है कि जब शिक्षा के साथ संस्कार और आत्मनिर्भरता जुड़ते हैं, तब समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव होता है। यह पहल आज राजस्थान में एक प्रेरणादायक सामाजिक मॉडल के रूप में उभर रही है।